Friday, March 30, 2007

मीडिया में सब जायज़ है...

संजय श्रीवास्तव
कुछ लिखना है तो लिख दिया। कुछ दिखाना है तो चला दिया। कमोबेश अब यही सच है टेलीविजन पत्रकारिता का। और मजाक मजाक में उल जलूल खबर पर बहस छिड़ गई या खबरिया चैनल की रिपोर्ट हिट हो गयी तो कहना ही क्या। टीआरपी का ही तो खेल है। कुछ ऐसा ही हुआ शेखर कपूर और सुचित्रा सेन की जिन्दगी में प्रीति जिंटा को डाल कर। सच जो भी हो,खबर मसालेदार थी। जाहिर है चलेगी भी,सो गिरते पड़ते कुछ जगह चल भी गई। भले उसे मुंबई के अखबार मीड डे से ही क्यों न उठाया गया हो।एक जगह चली तो दूसरे चैनल की भी नींद टूटी। उसने भी चला दिया..। दिखाने को कुछ नहीं तो लिख कर बताने को तो है ही।
मजे की बात ये है कि इस तरह खबरों को चलाने का ठेका उन्हीं के पास है जो गाहे बगाहे अखबार और पत्रिकाओं में मीडिया और खबरों की दुर्दशा का रोना रोते हैं। आम आदमी को भले ही सुचित्रा और शेखर कपूर की जिन्दगी में प्रीति जिंटा के आने से कोई लेना देना न हो, मीडिया उन्हें जरुर एहसास करा देगा कि वो अब तक इतनी बड़ी खबर से अंजान थे। कुछ दिनों पहले जब प्रीति की बॉम्बे डाइंग के मालिक के बेटे नेस वाडिया से शादी की अफवाह उड़ी तो उसने प्रीति के घर वालों से कही ज्यादा मीडिया जगत को परेशान कर दिया। एक विदेशी मीडिया ने तो यहां तक कह डाला कि अगर प्रीति ज़िंटा नेस से शादी करती हैं तो वे पाकिस्तान के क़ायदे आज़म मोहम्मद अली जिन्ना के परिवार से जुड़ जाएंगी। दरअसल,नेस वाडिया मोहम्मद अली ज़िन्ना के परनाती हैं। रिपोर्ट में लिखा था कि प्रीति पहले ही मान चुकी हैं कि वो नेस को पसंद करती हैं और नेस और उनके बीच प्रेम संबंध है। यही नहीं उसमें अंदर तक की खबर थी कि नेस के परिवार में पारसी, ईसाई और इस्लामी परंपराओं का पालन एक साथ होता है। जबकि दूसरी ओर प्रीति सेना के अफ़सर की बेटी हैं,उनके एक भाई भी सेना में हैं। अब सवाल ये है कि हम इसे किस आधार पर खोजी पत्रकारिता कह सकते हैं। किसी के निजी जीवन में दखल को कहा तक जायज़ माना जाए ? या हर वो कदम सही है जिससे समाज का भला हो? इसमें कोई शक नहीं कि मीडिया के एक बड़े हिस्से का लम्पटीकरण हो गया है, उसका लक्ष्य अपना रेटिंग बढ़ाना भर है। मीडिया विश्लेषक सुधीश पचौरी की उस बात से मैं सौ फीसदी सहमत हूं कि जनता की इतनी समस्याएं हैं उन तमाम चीज़ों पर कोई खोजपूर्ण रिपोर्ट लाकर जनता को जागृत करने की जरुरत नहीं समझता है। उसकी जगह कुछ नामचीन लोगों के निजी जीवन में ताकझांक करने से भला क्या होगा।
टीवी के पत्रकार भाईयों को शायद ये बात हजम न हो, वो दलील में ये कह भी सकते है कि कोई ऐसा चैनल बता दीजिए जो अपने टीआरपी को कम करने के लिए काम करता हो,कंपटेटिव मार्केट में रहना है तो जाहि है वही काम करेंगे जो जनता के हित में हो। लेकिन ये भी तो मीडिया को ही सोचना होगा कि आखिर किन वजहों से गंभीर मुद्दों और बड़ी खबरों से हट कर उन्हें ऐसी खबरों को परोसने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है।

Monday, March 26, 2007

फालतू क्रिएशन: वो नहीं रहेंगे बच्चे

विकास मिश्र इस ब्लॉग के पुराने साथी है। आजतक से जुड़ने के पहले कई पत्र पत्रिकाओं का संपादन कर चुके हैं। खास बात ये है कि खबर के साथ साथ व्यंग पर भी इनकी अच्छी पकड़ है। इस सप्ताह भी उन्होंने अपने व्यंग के जरिए अपनी बात रखने की कोशिश की है।
रविवार का दिन। सुर्तीलाल अचानक घर पर धमक गए। दरवाजा खोला। घर में सोफे पर आसन जमाकर बैठ गए। बोले-का हो पंडित सुना है बेटे की तबीयत नासाज है। क्या हुआ है उसे। चार दिन से वायरल फीवर हुआ है। कमजोरी भी काफी है। बड़े प्राइवेट अस्पताल में दिखाया था। हजारों का चूना लग गया, लेकिन तबीयत में कुछ खास सुधार नहीं है। मैंने सुर्तीलाल को बताया। सुर्तीलाल भड़क गए। बोले-तुम भी कमाल करते हो पंडित। फंस गए ना प्राइवेट अस्पताल के चंगुल में। बच्चे का एक रोग ठीक करेंगे। चार नए रोग गिफ्ट में पकड़ा देंगे। अरे इसे तुलसी मिर्च का काढ़ा पिलाओ। कहो खूब खाए पिए, ठीक हो जायेगा। अगर मेडिकल मेनिया में फंसे तो फंसते ही चले जाओगे। ये मेडिकल मेनिया क्या होता है। मैंने पूछा। हालांकि मैं ये नहीं जानता था कि सुर्तीलाल कबसे ऐसे ही किसी सवाल का इंतजार कर रहे थे। उनका पूरा ज्ञान बाहर आने के लिए फड़फड़ा उठा। पान की एक गिलौरी मुंह में दाबा और सुपाड़ी से थोड़ा चूना उठाकर मुंह में दे मारा। फिर बोले-मेडिकल मेनिया आज के दौर की सबसे बड़ी बीमारी है। ये उनको होती है, जिनके पास चार पैसे आ जाते हैं। हर छींक-जुकाम पर अस्पताल भाग जाते हैं। हर हफ्ते कोई ना कोई जांच करवाते हैं। अगर नौकरी में हैं और मेडीक्लेम पॉलिसी ले रखी है तो अस्पतालों के चक्कर काटना दिनचर्या में शामिल हो जाता है। अस्पताल तो पलकें बिछाए ऐसे ही शिकार की तलाश में रहते हैं। यहां न सिर्फ रोगों का इलाज होता है, बल्कि इलाज कराने पर नए रोग गिफ्ट में भी मिलते हैं। अस्पतालों का मोटा बिल बनता रहे, इसके अलावा उन्हें किसी और चीज से भला क्या मतलब। मैंने टोका- तो क्या सभी अस्पताल सिर्फ पैसा कमाने के लिए बने हैं। सुर्तीलाल बोले- सौ फीसदी पंडित सौ फीसदी। प्राइवेट अस्पताल हैं, बिना पैसे के तो इसमें घुसने भी नहीं पाओगे। हां सरकारी अस्पतालों में लगभग मुफ्त इलाज होता है। लेकिन उसमें भी पेंच हैं। सरकारी डॉक्टर एक तो अस्पताल आते नहीं। अगर भूले भटके अस्पताल में पहुंच गए तो मरीज को अपनी प्राइवेट क्लीनिक या अस्पताल में बुलाते हैं। फिर लगाते रहो चक्कर। जो उनके प्राइवेट क्लीनिक पर नहीं जाता। वो भगवान भरोसे अस्पताल में सड़ता रहता है। यही नहीं पंडित ये डॉक्टर जो दवाइयां लिखते हैं, वो सरकारी अस्पताल में नहीं मिलतीं, बल्कि डॉक्टर साहब की पेट मेडिकल स्टोर पर ही मिलती हैं।मैं-सुर्तीलाल जी, सरकारी डॉक्टरों की करतूत क्या सरकार को नहीं मालूम। सुर्तीलाल-सरकार सब जानती है पंडित। लेकिन ये सरकार भी उन डॉक्टरों से कुछ कम नहीं है। अब देखो। बाबा रामदेव योग सिखाकर रोग भगाने लगे तो स्वास्थ्य मंत्री के पेट में दर्द होने लगा। बड़े-बड़े अस्पतालों की नींव हिलने लगी। सभी स्वास्थ्य मंत्री से पूछने लगे-बाबा फ्री में इलाज करेगा तो हमारा खर्चा-बर्चा कैसे चलेगा। हम भी चुनाव लड़ने के लिए फूटी कौड़ी भी नहीं देंगे। समझ लेना। स्वास्थ्यमंत्री घबराए और झटपट बयान दे डाला कि योग से कोई रोग ठीक नहीं होता। अब चिल्लाएं बाबा कुछ होने का नहीं। इस बीच गर्म पकौड़ों के साथ चाय आ गई थी। प्लेट में सजी बर्फी की ओर मोहक मुस्कान फेंककर सुर्तीलाल ने भांग की गोलियां जेब से निकालीं और तीन गोलियां गटकने के बाद दो बर्फियां उदरस्थ कीं। चाय की चुस्की लेते हुए बोले-पंडित, सरकार सेहत के बारे में कितनी चिंतित है, जानना चाहते हो तो सुनो। सरकार कन्फ्यूज है। दुनिया भर में एड्स का इलाज खोजा जा रहा है। और हमारी सरकार कंडोम में ही फंसी है। एक ही इलाज मिला कंडोम। टीवी पर कहवाने लगे- कंडोम बिंदास बोल। अब जिस बच्चे की निकर गीली हो जाती थी बाप के सामने जाते हुए, वो विज्ञापन रटकर बाप से बोल रहा है-पापा बिंदास बोल कंडोम। हालांकि इसके बाद बच्चा क्यों पिट जाता है, इसके बारे में बच्चे के पापा तो जानते हैं, बच्चा नहीं जानता। बच्चा तो भारत माता की जय, जय जवान जय किसान, सोनिया गांधी जिंदाबाद, अटल बिहारी जिंदाबाद की ही तर्ज पर नारा लगाता है कंडोम बिंदास बोल। मुसीबत तो ये कि पापा ने क्यों पीटा, ये तो खुद पापा भी नहीं बता सकते। मैं-लेकिन सुर्तीलाल जी, एड्स जागरूकता के लिए ये तो जरूरी है। सुर्तीलाल-बहुत खूब। करो जागरूकता। हमारी सरकार तो चार कदम आगे बढ़कर जागरूक करने जा रही है। जानते हो पंडित। स्कूलों में अब हमारे-तुम्हारे बच्चों को गुरुजी सिखाएंगे कंडोम का इस्तेमाल। बाकायदा कोर्स लागू किया जा रहा है। सरकारी फरमान के मुताबिक छठीं क्लास से लेकर 12वीं तक गुरुजी बच्चों को पूरा कोकशास्त्र रटा देंगे। सरकार का पूरा ध्यान इन दिनों सेक्स एजुकेशन पर ही जा टिका है। बच्चों को बाकायदा बताया जाएगा कि किस उम्र में वो बाप बनने लायक हो जायेंगे और किस उम्र में लड़कियां मां बनने लायक। कैसे वो बनेगा बाप और कैसे बनेंगी लड़कियां बच्चों की मां। ये सब बचपन में ही सिखा दिया जायेगा। तब घर में कंडोम बिंदास नहीं बोला जायेगा, बल्कि स्कूली बस्ते में किताबों के बीच कंडोम भी रखेंगे। बिल्कुल पेन, पेंसिल की तरह। मैं-सुर्तीलाल जी आप दकियानूसी बातें कर रहे हैं। ये तो अच्छा ही है कि बच्चों को सेक्स के बारे में उचित शिक्षा मिलेगी। ये शिक्षा अज्ञानता से बचाएगी। सुर्तीलाल-चुप भी करो पंडित। आदम और हव्वा ने किस गुरु से ट्रेनिंग ली थी। गाय, भैंस, घोड़े-घोड़ी, कुत्ते कुतिया को किस युनिवर्सिटी में सेक्स एजूकेशन में पीएचडी करवाई जाती है। फिर उन्हें बच्चे कैसे होते हैं। अरे पंडित कुदरत खुद सिखा देती है। सुर्तीलाल पर भंग का सुरूर तो पहले से ही था। एक कटोरी हलवा गटककर तो उनकी आंखें और सुर्ख हो गईं। भंग की तरंग में बोले- -पंडित कलियुग के इस चौथे चरण में सेहत की बात बेमानी है। तन की सेहत तो बना लोगे लेकिन मन का क्या होगा। बच्चे दिन रात टीवी पर हीरो हीरोइन की चूमा चाटी देखेंगे तो क्या खाक बनेगी सेहत। टीवी पर चॉकलेट, टॉफी क्रंच, मंच, चोकोस, मैगी, कोला के विज्ञापन देखने के बाद बच्चों को वही चाहिए. दूध को तो देखते ही उन्हें घिन आने लगती है। बच्चे भी बड़े कनफ्यूज हैं। शाहरुख खान वाला च्यवनप्राश खाएं कि अमिताभ बच्चन वाला। अलबत्ता च्यवनप्राश बनाने वालों ने मोटी रकम देकर इनकी सेहत जरूर दुरुस्त कर दी है। अब बिग बी मुलायम सिंह की सेहत सुधारने में लगे हैं। ऐसा च्यवनप्राश खिलाया है कि दुबला पतला उत्तर प्रदेश दमदार हो गया है। कहते हैं कि यूपी में बहुत दम है। लेकिन चुनाव आयोग ने ऐसा डंक मारा है कि मुलायम को मलेरिया का खतरा पैदा हो गया है। वैसे भी उन्हें माया रोग का अंदेशा है। पान की एक और गिलौरी मुंह में झोंककर सुर्तीलाल ने उसे बगल में दबाया और बोले-वैसे पंडित, रोगों की कहानी भी खूब है। जितना बड़ा आदमी, उतना बड़ा रोग। जितना पैसा, दवा-दारू के उतने बहाने। किसी मजदूर को हॉर्ट अटैक से मरते हमने नहीं देखा है, बुखार-सर्दी जैसे रोग तो तुलसी के पत्ते और अदरक के काढ़ा से ही छूमंतर हो जाते हैं। चोट लगी तो हल्दी-प्याज। कट गया तो घाव पर शिवाम्बु चुआ लिया। न टिटनेस का खतरा न जख्म बढ़ने का। हां एक रोग जरूर है, जो उनकी जिंदगी लेकर ही मानता है और वो है गरीबी का रोगा। भूख के आगे उनकी एक दवा नहीं चलती। भूख जानलेवा होती है, जान लेकर ही मानती है।

Saturday, March 24, 2007

भंग क्यों नहीं कर देते बीसीसीई


त्रिनिदाद में जो हुआ उससे हो सकता है लाखों खेल प्रेमियों को हैरत और निराशा हुई हो,लेकिन मुझे कतई नहीं। मालूम था टीम इंडिया हारेगी तो यही कहां जाएगा - उम्मीदें चकनाचूर,टिकट कटा,शर्मनाक हार और न जाने क्या क्या। पहले में ऐसा हुआ है। एक मैच में थोड़ा भी ठीक ठाक रहा तो कल तक कूड़ा खेलने का आरोप झेल रहे खिलाड़ियों के भी दिन फिर जाते हैं। पिछले मैच में यहां तक कहा गया कि अगर टीम इंडिया के बल्ले में कूबत नहीं तो क्यों बिना वजह चमका रहे हैं। बीसीआई को भंग क्यों नहीं कर देते है।
कुछ पल के लिए ये बातें गुस्से या खेल प्रेमियों की भावनाओं से जोड़ कर देख सकते हैं,लेकिन एक सच ये भी कि जिस वक्त खिलाड़ियों को ज्यादा अभ्यास की जरुरत होती है उस वक्त वो विज्ञापन और रैम्प पर चलने में ध्यान देते हैं। मैं ये नहीं कहता कि वो खेल मे ध्यान नहीं देते। लेकिन उन्हें ये भी तो समझना चाहिए कि जिस मालामाल बीसीआई के बूते वो हीरो बने फिर रहे है उसमें आम आदमी की ही गाढ़ी कमाई लगी है। खेल के नाम पर मोटी रकम पाने वालो से जीत की उम्मीद आखिर जनता कब तक नहीं करेगी। कब तक क्रिकेट को किस्मत से जोड़ कर सचाई से मुंह मोड़ते रहेंगे। जिन खिलाड़ियों के लिए पूरे देश दुआ कर रहा था उन्हें शुक्रवार के मैच में द्ख कर लगा कि पवेलियन लौटने की होड़ लगी है। और यही हुआ।आसान हो चुके विकेट पर एक हासिल किए जा सकने वाले योग का पीछा करते हुए बड़े बड़े शेर 185 रनों पर ढ़ेर हो गए और श्रीलंका ने 69 रनों से मैच जीत लिया। देर रात तक जाग कर वर्ल्डकप के इस खेल का मजा लेने वाले खेल प्रेमियों को सबसे ज्यादा झटका तब लगा जब महान खिलाड़ी सचिन औऱ मैदान में रंग जमाने वाले धोनी बिना खाता खोले लौट गए। दादा भी कमाल नहीं दिखा सके। हां अपने नवाब साहब को कहने के लिए कुछ रन जरुर मिल गए जो टीम इंडिया के लिए ऊंट के मुंह में जीरा की तरह ही था।

प्रदर्शन के बाद जब टीम इंडिया भारत लौटेगी तो वो अपने प्रशंसकों से हार की वजह क्या बताएगी नहीं मालूम। लेकिन बीसीआई को एक बार दोबारा जरुर सोचना चाहिए कि आखिर उस का क्या मकसद है और कैसी टीम तैयार करना चाहती। बहाने तो उसके पास अब भी काफी होंगे। लेकिन हर बार बहाना काम नहीं आता ये भी ध्यान रखना चाहिए। कही ऐसा न हो कि बीसीसीआई पर ही सवाल न उठने लगे । जिसकी में घुसने की ख्वाहिश में बड़े बड़े नेता मरने मारने पर उतारु हो जाते हैं।

Friday, March 23, 2007

बहस: वर्दी वाला गुंडा


नासिक से मोहन देसाई लिखते हैं कि उनके गांव में जिस वक्त हिन्दू नए साल का जश्न मनाया जा रहा था उसी वक्त एक दुकान पर एक फौजी अपनी ताकत दिखा रहा था। हालांकि वर्दी का रौब नयी बात नहीं है। लेकिन पुलिस के बाद सेना के लोग भी इस तरह की घटनाओं से जुड़ने लगे है। खास बात ये है कि झगड़ा सिर्फ इस बात को लेकर हुआ था कि चाय वाले ने पहले उस फौजी को चाय क्यों नहीं दी।

कुछ ऐसा ही वाकया नए साल पर कोलकाता में हुआ था । जिसकी गूंज कई दिनों तक सुनाई देती रही। रविवार रात पार्क स्ट्रीट पर नये साल की अगवानी के लिए भारी भीड़ जुटी थी। इस जमघट में मद्रास रेजीमेंट के कई अधिकारी भी मौजूद थे। लेकिन न सिर्फ कुछ अफसर जश्न के जोश में होश खो बैठे बल्कि पुलिस के साथ भी हाथा पाई की। वो हाथा पाई किस कदर थी इसका अंदाजा पार्क स्ट्रीट थाने को देख कर लगाया जा सकता था। जिन लोगों ने अपने टेलीविजन पर इस रिपोर्ट को देखा उनके लिए वाकई ये यकीन करना मुश्किल था कि सेना और पुलिस भी एक दूसरे के खून के प्यासे हो सकते हैं।
रिपोर्ट की पहली लाइन ही कुछ यूं थी -"जरा इस नजारे को देखिए,ये कमरा किसी के घर का नहीं बल्कि कोलकाता के पार्क स्ट्रीट थाने का है,जहां हमारे आपके रखवाले रहते हैं और इसका ये हाल किया है हमारे देश के रखवालों ने। पुलिस नए साल के जश्न के दौरान जब फौज के दो अफसरों लेफ्टिनेंट कर्नल चंद्र प्रताप सिंह और कैप्टन महेश को रात के करीब एक बजे पार्क स्ट्रीट इलाके में लड़कियों से छेड़छाड के मामले में थाने लाई तो वहां बवाल मच गया। दरअसल जैसे ही इन अफसरों को थाने लाए जाने की खबर फैली कुछ ही मिनटो में सेना के दर्जनभर से ज्यादा जवानों ने थाने में धावा बोल दिया। न सिर्फ वो आरोपी अफसरों को छुड़ा ले गए बल्कि जम कर तोड़ फोड़ भी की।" हैरत की बात ये है कि फौज के दोनों अफसरों के खिलाफ छेड़छाड़ का मामला दर्ज किए जाने के बावजूद कोलकाता में सेना का कोई अफसर मुंह खोलने को तैयार नहीं था। सेना के जिन दर्जनभर से ज्यादा जवानों ने थाने में तोड़ फोड़ की उनके खिलाफ क्या कार्रवाई हुई या सेना क्या कर रही है इस पर भी किसी के पास कोई जवाब नहीं था। नतीजतन पुलिस को इस मामले की शिक़ायत प्रधानमंत्री कार्यालय और सेना मुख्यालय से करनी पड़ी। तब कही जा कर सेना के प्रवक्ता ने कर्नल एस के सखुजा ने कहां कि जांच के आदेश दे दिए गए हैं ।सेना और पुलिस के बीच लड़ाई कोई नई बात नहीं है। लेकिन सेना का कोई अफसर लड़कियों को छेड़ते सरेआम पकड़ा जाए ये बात कुछ अजीब जरुर लगती है। शराब के नशे में शायद वो ये भी भूल गए कि उनकी हरकत के बाद किसी को उनके परिचय की जरुरत नहीं पड़ेगी बल्कि उनकी वर्दी खुद सब कुछ बयां कर देगी। हुआ भी यहीं।
पुलिस ने वर्दी की लाज का वास्ता देते हुए हुए पहले तो लेफ्टिनेंट कर्नल साहब औऱ कैप्टन महाशय को समझाने की कोशिश की, लेकिन बात जब नहीं बनी तो उन्हें थाने ले जाना ही बेहतर समझा। लेकिन उसे क्या पता था कि उन्हें थाना पहुंचाना इतना मंहगा पड़ जाएगा। लेकिन सेना के बिगडैंल अफसर शायद ये भूल गए कि अगर वक्त रहते पुलिस उन्हें थाने नहीं ले जाती तो सही कसर वहां मौजूद आम जनता कर देती। जो ऐसे मौको पर मनचलों पर हाथ साफ करना अपना कर्तव्य समझ लेती है। फिर भीड़ में किस ने किस अफसर की कितनी धुनाई की इसका लेखा जोखा कौन याद रखता । शायद पार्क स्ट्रीट से पुलिस उन्हें थाने यही समझाने ले गई थी।

Wednesday, March 21, 2007

दिल से खेलो सहवाग


सहवाग पर सन्डे की रीता के विचार-


सहवाग भविष्य में क्या करेंगे अभी नहीं कहा जा सकता। लेकिन शतक बनाकर अपनी इमेज जरुर ठीक कर ली हैं। कप्तान ने कहा - सहवाग ने नेट पर ख़ूब पसीना बहाया था। द्रविड़ ने कहा मुझे मालूम था सहवाग का बल्ला बोलेगा । और यही हुवा । लेकिन बात तो तब बनेगी जब बल्ला आगे भी बोले । एक मैच में कुछ नहीं कहा जा सकता। लेकिन मेरा मानना है कि खेल तभी ठीक लगता हैं जब हर खिलाडी दिल से खेले । और ये बात हर के लिए है। लेकिन ऐसा होता कम है। पाक के बारे में तो कह सकते हैं कि वहाँ दबाव ज्यादा है जो नहीं होना चाहिए । दबाव के कारण ही कई बार खिलाड़ी नही खेल पाते।

Sunday, March 18, 2007

हाथ में होती है किस्मत ?


कहते हैं किस्मत हाथ में होती है। लेकिन सच तो ये भी है कि जिनके हाथ नहीं होते उनकी भी किस्मत होती है। फिर भी कल के बारे में जानने की जिज्ञासा सभी में होती है। उनमें भी जो किस्मत से ज्यादा कर्म पर यकीन करते हैं। होना भी यही चाहिए। बिना कर्म के किस्मत भी साथ नहीं देती।
मेरे एक मित्र को ये बातें बकवास लगती हैं। कहते हैं सब मनगढंत कहानियां है जिसे अपने मतलब के लिए हजारों साल पहले कुछ लोगों ने गढ़ी थी। पिछले दिनों उनका फोन आया कहा बहुत परेशान हैं। दफ्तर में बॉस से खटपट हो गई है। मैने कहां मेहनत से काम करो बात बन जाएगी। इससे पहले की मेरी बात पर अमल करते बर्खास्त हो गए। सरकारी नौकरी ऊपर से दिल्ली पुलिस की।
मुझे मालूम था ज्योतिष पर उनका यकीन नहीं फिर भी मजाक में कहा- किसी ज्योतिषी से राय क्यों नहीं लेते । वे नाराज तो नहीं हुए बल्कि धीरे से बोले यार जा चुका हूं। एक अंगूठी भी पहनी फिर भी सब कूड़ा हो गया। मैने तपाक से पूछा तो उसे उतारा या नहीं । जवाब था - यार कही और गड़बड़ न हो जाए। ऐसे लोग हम सभी के आस पास है । शायद हम खुद भी। जब बात बन जाती है तो कर्म का दंभ भरते हैं। बिगड़े ही सहारा खोजने लगते हैं। मेरे कहने का मतलब सिर्फ यही है कि अगर रत्न पहनते भी हैं तो इतनी जानकारी तो रखिए ही कि किस राशि को कौन सा रत्न पहनना चाहिए। लेकिन ये भी ध्यान रखाना चाहिए कि सिर्फ राशि के आधार पर पहने से पूरा फायदा नहीं होगा। जब तक कि ग्रहों की दशा और स्थान भी उसके अनुकूल न हो। वैसे मेरा व्यक्तिगत अनुभव यही रहा है कि जब बुरा वक्त होता है तो किसी रत्न से उसे नहीं टाला जा सकता। समझदारी इसी में है कि कुछ वक्त तक सही रास्ते पर संभल कर चलने की आदत डाल ली जाए।

बहुत कुछ कहती है हथेली


कहते हैं किस्मत हाथ में होती है। लेकिन हाथ के रंग भी बहुत कुछ बयां करते हैं। यानी हथेली के वर्ण को देख सामने वाले व्यक्ति का व्यक्तित्व जाना जा सकता है। हाथ देख कर दूसरो के बार बहुत कुछ बताने का दावा करने वालों के लिए ये जानकारी भी कारगर साबित हो सकती है। सबसे पहले हाथ को देखते समय हथेली के रंग पर भी गौर करना चाहिए। किसी की हथेली देखने से पहले उसे छुए बगैर ही देखना चाहिए। छूने से हथेली का मूल रंग बदल जाने से वह अपनी सामान्य अवस्था में नहीं रहता। लाल रंग की हथेली वाला व्यक्ति गुस्सैल स्वभाव का होगा व दूसरों पर जल्दी विश्वास नहीं करेगा। ऐसे व्यक्ति तुरंत नाराज और फौरन संतुष्ट होने वाले होते हैं। कैसे इनको गुस्सा आ जाए, इसका कोई आभास नहीं हो पाता। सामान्यत: ऐसे व्यक्ति अदूरदर्शी व संकीर्ण विचारों के होते हैं। ये सनकी, तरंगी और विवेकरहित भी होते हैं। सूर्ख लाल हथेली वाले व्यक्ति क्रूर, हिंसक व अपराधवृत्ति वाले तथा स्वाथी भी होते हैं। ऐसे व्यक्ति अपने स्वार्थ के लिए दोस्तों को भी धोखा दे सकते हैं। ऐसे व्यक्ति पर विश्वास नहीं करना चाहिए।जिनकी हथेली का रंग गुलाबी हो, वह स्वस्थ, सहृदय तथा उन्न्त विचारों वाले होते हैं। इनके रहन-सहन में शालीनता दिखाई है। ऐसे व्यक्ति चाहे स्त्री हो या पुरुष, आदर्शों और संतुलित वचारों वाले होते हैं। ऐसे जातक जीवन में साधारण श्रेणी से उठकर अत्यंत ऊंचे स्तर तक पहुंचने में समर्थ होते हैं। वास्तव में ऐसे व्यक्ति ही समाज की सच्ची सेवा करने वाले होते हैं।पीली हथेली वाले रागी होते हैं या उनके शरीर में रक्त की कमी होती है। ऐसे जातक अस्थिर स्वभाव के तथा चिड़चिड़ा एवं संकीर्ण बुद्धि के साथ-साथ दिमागी कमजोरी का शिकार रहते हैं। ये मंद बुद्धि भी हो सकते हैं।चिकनी व नरम त्वचा वाले सहृदयी होते हैं। ये निरंतर लक्ष्की ओर बढ़ते रहते हैं। ऐसे व्यक्तियों का लक्ष्य सदैव स्पष्ट होता है। जीवन में अधिकतर ऐसे ही व्यक्ति सफल होते हैं। सूखी त्वचा वाले सामान्य, अस्थिर स्वभाव वाले होते हैं। ऐसे व्यक्ति स्वयं किसी प्रकार का निर्णय नहीं ले पाते। दूसरों की राय के अनुसार वे कार्य करते हैं। इनके कार्यों में कोई सामंजस्य नहीं रहता। मानसिक तथा शारीरिक दोनों ही दृष्टियों से ये लगभग बीमार रहते हैं।

How You Use Your Mobile Phone

Aries : Flash Harrys and flirty WAGs who love a phone with funkiness and will use it to impress a potential partner.
Taurus : Taureans and technology? Er, no thank you. They keep it simple, and prefer to text to lure in that special someone.
Gemini : Geminis adore technology. They love to have the `gadget' phone, and will use all facets of their mobile phone to organise their life.
Cancer : Cancerians like to keep their life simple, they are faithful in love and will not use their mobile for anything untoward.
Leo : Leos love the finer things in life and will go to any lengths to impress their partner, and that includes what mobile they have.
Virgo : A precise phone, a sleek phone, an efficient phone, a phone that's uncomplicated and sophisticated - Virgo style.
Libra : Librans like to use their phone as a pulling partner, and don't be surprised to find a few texts on their mobile that really shouldn't be there!
Scorpio : An air of mystery surrounds most Scorpios and their phones reflect this. Dark, mysterious and difficult to fathom, they like to play their card close to their chest.
Sagittarius : Sagittarians are straight talkers and like to communicate verbally, not a lot of texting going on here.
Capricorn : Capricorns are born sensible and so are their phones. Technology? Not interested. Aquarian : Aquarians are incredibly bright, but technology sometimes overwhelms them. Quirky, funky, simple and play their relationships in the same way.
Pisceans : Any phone that allows you to communicate on a million different levels please, these are born talkers and will embrace new technology.